बहादुरी को बनाया अपना आभूषण

 बहादुरी को बनाया अपना आभूषण

-सर्पमित्र महिला वनीता बोराड़े से डॉ. दर्शनी प्रिय का साक्षात्कार

वन्य प्राणी, जंगल, पशु-पक्षी, पर्यावरण के जीवन संजीवनी है। वन का वैभव वन्य पशुओ से ही शोभायमान होता है। चाहे सरीसृप हो, चौपाया या मांसभक्षी प्रकृति की सुंदरता में वे समग्र तत्व रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन करते है। इनकी वजह से जीवन चक्र को दीर्घकालिक रूप से न केवल ऊर्वरा बनाने में मदद मिलती है। अपितु जीवन पर यथास्थिति बनाये रखने में भी सहायता मिलती है। सदियों से इस ग्रह का आस्तित्व जीव-जन्तुओ के बूते ही सुरक्षित रहा है। इसमें पशु संरक्षकों और वन्य जीव प्रेमियों की बड़ी भूमिका है।

महाराष्ट्र की एक ऐसी ही सर्पमित्र महिला अपने कार्यों से न केवल दूसरों के लिए नजीर बन रहीं हैं अपितु वन्य प्राणियों को उनके कृत्रिम आवास से निकाल कर उन्हें प्राकृतिक आवास में पहुंचा रही है। प्रायः हमारे समाज में सर्प संरक्षण या उनके रेसक्यू का कार्य समाज के पुरुषों द्वारा किया जाता रहा है क्यांकि ऐसी धारणा है कि ऐसे कार्यों में अतिरिक्त साहस, बहादुरी और आत्मविश्वास की आवश्यकता होती है। महाराष्ट्र के बुलढाणा की रहने वाली वनीता बोराड़े इस साहसिक कार्य के जरिये पर्यावरण की रक्षा तो कर ही रही हैं साथ ही सर्प जैसे अत्यंत खतरनाक माने जाने वाले जीव को सुरक्षित उनके प्राकृतिक आवास तक भी पहुंचा रही है। उन्होने सत्तर हजार सेभी ज्यादा सांपों की जान बचाकर उनको उनके प्राकृतिक आवास तक पहुंचाया है और साथ ही जान-माल की भी रक्षा कर रहीं है।

पत्रकार और लेखिका डॉ. दर्शनी प्रिय ने हाल ही में उनसे मुलाकात कर इस वन्य प्राणी रक्षक से बात कर उनके कार्यों का जायजा लिया। इसी दौरान कुछ प्रश्न भी पूछे गए।

प्रश्न- वनीता जी आपको आपके अभूतपूर्व कार्यों के लिए राष्ट्रीय स्तर का नारी शक्ति सम्मान भी मिला है और भी कई सम्मान आपके हिस्से बहुत पहले से है। इस पेशे में कैसे आना हुआ? जब आपने कार्य शुरु किया था तब घर वालों की क्या प्रतिक्रिया थी?

उत्तर- दरअसल मेरे लिए ये बिल्कुल भी नया नहीं था। बचपन से ही घर का ऐसा माहौल थी कि ऐसे माहौल में ढ़ालने में आसानी हुई। पिताजी भजन-कीर्तन के साथ वन्य जीवों की रक्षा के काम में लगे थे। आस-पास जब जानवरों को कोई आहत यापीड़ित करता पिताजी तुरंत हस्तक्षेप करतें और उन जानवरों को अपने घर ले आते। मैं बचपन से ही उनके साथ जाती थी। मैने भी अनुकरण किया। चूंकि जंगल के बीचों बीच हमारा घर था इसलिए वन्य जीवों के प्रति अतिश्य स्नेह और सेवा का भाव स्वतः ही जागृत हो गया। बड़े होने पर धीरे-धीरे इस पारिवारिक पेशे में आ गई। इस पेशे में महिलाओं की संख्या बहुत कम है इसलिए मुझे विषैले सांपों के बीच देखकर अक्सर लोगों को आश्चर्य और विस्मय होता है लेकिन मेरे लिए तो यह कार्य जोश और उत्साह से भरने वाला है।

प्रश्न- वन्य जीवों की संख्या लगातार घट रही है। अनुकूल वातावरण न मिलने और मावन हस्तक्षेप के चलते वे विलुप्त होने के कगार पर है खासतौर से सर्प क्योकि आमतौर पर मान्यता है कि ये जहरीले होते है इसलिए भयवश इन्हें बड़ी संख्या में मारा जा रहा है इससे पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ रहा है ?

उत्तर - देश में पाये जाने वाले सांप ज्यादातर जहरीले नहीं होते। हमारे यहां सांप के भय से आमतौर पर मृत्यु होती है न कि उसके दंश से। भारत में 550 से अधिक प्रजातियों के सांप हैं जिनमें से दस फीसदी से भी कम प्रजाति के सांप जहरीले होते हैं। अगर दिल्ली में सांपों की 13 प्रजातियां पाई जाती हैं, इनमें से केवल दो - कोबरा और करैत विषैले होते हैं। खास बात यह भी है कि दिल्ली से हर साल करीब 2400 से 3000 सांप रेस्क्यू किए जाते हैं। सांप को मारना या उसके खाल के साथ पकड़े जाना वन्य जीव संरक्षा कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आता है लेकिन भय और लालच के चलते लोग सांपों को बड़ी संख्या में मार रहे हैं। पारिस्थितिकी के लिए यह नुकसानदायक है।

प्रश्न- सांप हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए कैसे और क्या जरुरी हैं? 

उत्तर- सांप हमारे पर्यावरण के लिए बेहद जरुरी है क्योंकि ये कीट-मकोड़ों और चूहों की आबादी को नियंत्रित करते हैं। किसानों के वे सबसे अच्छे दोस्त हैं, क्योंकि चूहे 20 फीसदी तक फसल को नुकसान पहुंचा देते हैं। पर्यावरण प्रदूषण को भी वे संकेतक के रूप में जाहिर करते हैं। 'सांप संकेतक प्रजाति हैं, इसका मतलब यह है कि आबोहवा बदलने पर सबसे पहले वही प्रभावित होते हैं। इस लिहाज से उनकी मौजूदगी हमारी मौजूदगी को सुनिश्चित करती है। हम सांपों के महत्व को महसूस नहीं करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि उनके बगैर हम कीटों और चूहों की भारी परेशान झेलेगें।

प्रश्न- जनसामान्य को क्या संदेश देगें ताकि पर्यावरण की रक्षा सुचारु रूप से हो सके ?

उत्तर- पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो हम सुरक्षित रहेगें। हमारी सत्ता हमारी धरती से है। वर्तमान समय में इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा काम करने की जरुरत है लेकिन प्रकृति, जल, जंगल और जमीन लगातार हमारी अनदेखी झेल रही है। मुझे लगता है इसमें गैर-सरकारी संस्थायें महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। उन्हें पहल करना चाहिए और लोगों में जनजागरुकता फैलानी चाहिए नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हम हवा, पानी और सुरम्य वातारवरण के लिए तरसेगें। समय पूर्व चेतने का समय है।


पर्यावरण तभी सुधरेगा जब हम प्रकृति के प्रति मानवीय होंगे... ।
- प्रकृति दर्शन पत्रिका

Comments

Popular posts from this blog

Lady Snake Rescuer who Rescued 75000 snake whitout any fees..Let's meet Vanita....know about her life ‼️

मानव व वन्यजीव संघर्ष टाळण्यासाठी प्रतिबंधात्मक उपाय || निसर्गसंवर्धनाच्या दिशेने एक सशक्त जनजागृती चळवळ

सर्पमित्र वनिता बोराडे यांच्या नवसंशोधनाने सर्पदंशमृत्यूचा धोका संपणार….!!